तिरछी नजर | नया विचार

यदि कभी भविष्य में मैं किताब लिखूंगा तो उसका नाम तिरछी नजर रखूंगा। यह शीर्षक मुझे मंदिर की आखिरी वेदी पर सूझा। दिनांक १०-०५-२०२२ को सूझा। 

तिरछी नजर क्यों? 

यहां पर मैं वह सब विचारों का संक्षेप देना चाहूंगा जो 'तिरछी नजर' बनाते हैं। 

हम मंदिर जाते हैं। ज्यादातर लोग वहां भगवान सिवाय सब कुछ देखते हैं। भगवान सिवाय सभी चीजों के दर्शन करते हैं। शरीर से तो भगवान के सामने झुकने का दिखावा करते हैं। पर मन हमें कुछ और ही दिखाता है, सुनाता है। इसको मैं कहता हूं तिरछी नजर। 

मंदिर जाएं तो हमें सीधे-सीधे भगवान के दर्शन होने चाहिए। 

हम सीधे-सीधे भगवान को मन, आत्मा व शरीर से ना देख कर, अपनी तिरछी नजर का उपयोग करके यहां वहां अपना ध्यान ले जाते हैं। एक भगवान को देखने के बजाय १०० चीजों को देखते हैं। फिर कहते हैं कि भगवान या आत्मा को पाना बहुत मुश्किल है। 

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज गलत नहीं कहते जब वे यह दोहराते हैं कि मुक्तिपथ सीधा एवं सरल है। वह सचमुच में सीधा है। पर क्या करें तिरछी नजर आडे़ आ जाती है। 

मुझे पता है कि इस प्रकार की बातें विस्तृत रूप में ज्यादातर लोगों को बोर करेंगी। इस वजह से यह किताब लिखना ना बराबर है। पर यदि इस बात का विचार हम करेंगे तो मीठे फल पाने की संभावना है। आगे के लिए एक ऐसा बीज हम सभी में रहना चाहिए: सीधी नजर का उपयोग होना चाहिए ऐसी आशा करूंगा। 

राग द्वेष और तिरछी नजर 

राग-द्वेष और क्या है? हमारी तिरछी नजर का परिणाम ही तो है। हम जब अपने शत्रु को देखते हैं तो हमारे मन में विकल्प पैदा होते हैं। इसे मार दूं या इससे छुपकर/बचकर चलूं। जब हम अपने मित्र को देखते हैं तब ईर्ष्या भाव भी आ जाते हैं। यदि ईर्ष्या के विचार ना भी आए तो अनेक विकल्प उठना तो प्रारंभ हो ही जाते हैं। 

अच्छा होता है कि हम अपनी तिरछी नजर से ना अपने मित्र को देखते ना ही शत्रु को। अपने आपको देखते- जो कि बहुत नहीं तो सबसे कठिन है 😄 तो हमारे मन में ये विकल्प ना उठते, ये तरंगे ना उठतीं और मोक्ष जाने का हमारा पुरुषार्थ शीघ्र सफल होता। 

कहने का अर्थ है कि राग द्वेष हमारी तिरछी नजर का परिणाम है, हमारी नासा दृष्टि का नहीं।

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